Sunday, February 20, 2011

Jeevan ka Safar - Part I

अंधेरी  रात मे समुन्दर की लहरें , टूटी नाव मे एक बेहोश सैलानी को , एक वीराने द्वीप पर लाके छोड़ देती हैं , जहा जीवन की झलक इतनी  थम चुकी  है के इंसान का दिखना तो दूर की बात , पेड़े भी अपने पत्ते हिलाने से परहेज़ करती हैं .

लेकिन जाने कहा से, एक बूढा आकर इस घायल सैलानी को आसरा देता है. उसे अपने झोपडी मे ले जाता है , जो इतना बर्बाद हो चूका है, के चूहे भी उसमे रहना नापसंद करे . दिन रात वह बूढा इस जवान की देखबाल करता है , जब तक के एक दिन वो यात्री होश मे आकर अपने रक्षक से पूछता हैं 
"काका , इस वीरानी जगह मे तुम अकेले कैसे फस गए . अपनी ज़िन्दगी की कहानी ज़रा मुझे भी सुनाओ " 
तब वो बूढा खोयी हुई आँखो से अपनी बीती ज़िन्दगी को देखते हुवे कहता है
"
दुनिया के सागर मे
शारीर की कश्ती लेकर जिंदगी के सफ़र पर निकल चला था |
ना रास्ते की खबर थी , ना मंजिल की झलक 
फिर भी उमंगो  के तरंगो पर 
शारीर की कश्ती लेकर जिंदगी के सफ़र पर निकल चला था |

बहुत धोकेबाज़ है ये दुनिया,
तीर से देखो तो निशचल नीला विस्तार, 
लेकिन भीतर से है  उगलता भयंकर भवर |

लहरे इसकी, जो पास आती है और पावो को छूकर चली जाती है,
जैसे न्योता दे रही हो उस अन्जाने डगर की
जो इंतज़ार कर रहा है क्षितिज के उस  पार |

अनेक कश्तिया मेरी जैसी,
जो धीरे धीरे उस पतली सीमा के पास जाती है ,
जहा नीला आकाश मिलता है नीले समंदर से, और फिर गायब हो जाती है,
जैसे लुभा रही हो उस अन्देखी जन्नत की
जो इंतज़ार कर रहा है  क्षितिज के उस  पार |

इन्ही न्योतो के दिखावे मे आकर ,
इन्ही लुभाव्टो से लालच मे आकर  मै भी,
शारीर की कश्ती लेकर जिंदगी के सफ़र पर निकल चला था |

शुरू मे ये दुनिया बहुत महमान-नवाज़ थी |
जैसे ही नाव मे चढ़ा, तुरंत मुझे सागर के और भीतर ले जाने मे जुट गयी  |

दूर जाते हुए तट को देख कर,
मै खुश हो रहा था अपनी जिंदगी मे बदलाव देख कर |
लेकिन मुझे क्या पता था की जितनी तेज़ी से किनारा दूर हो रहा है ,
उतनी तेज़ी से मै दुनिया के दलदल मे और फँस रहा हू |

मिट जाती है किनारे की झलक आँख की पुतली से |
लेकिन तब भी नज़र ना आये वो डगर , कही भी ढूँढने से |

चमकती हुई बिजली आनेवाली आंधी का इशारा कर जाती है |
कड़कते गरज आनेवाले कशमकश की धम्कियां दे जाती है |

फिर आता है बदनसीबी  की वो भयानक तेज़ तूफ़ान
जो उस तमन्नावों के पाल मे छललीया कर देता है , जिसके सहारे मै अपनी कश्ती चला रहा था |

दुनिया के अनगिनत लोग समंदर के अनंत पानी की  तरह ,
जो अब तक ख़ामोशी से मेरे सफ़र को सहारा दे रहे थे ,
अचानक, समजुट हो कर मेरे नाव को डुबाने मे लग जाते है |

क्या यही है वो डगर, जिसकी लालच मे मै सब छोड़ निकला था ?
क्या यही है वो जन्नत, जिसकी खोज मे मै ढेर सारी उम्मीदे लेकर निकला था ?
क्या यही है मेरी तक़दीर, के दुनिया के शिकंज मे ऐसे फस जाऊ
जैसे शह्तान बच्चे  के हाथ मे बेजान खिलौना?

तूफ़ान थम्ता है और सूरज की रौशनी मेरे बर्बाद नाव पर पड़ती है ,
जैसे बलात्कारी मर्द की हँसी, अपने हवस के शिकार पर |

जाने कितने तूफानो के बाद ,
जिनकी गिनती करना भी मैने कब का छोड़ दिया था ,
मुझे ये द्वीप नज़र आया, जिसके दामन मै तब से राहत ले रहा हू |

यहा बैठ कर मै देखता हू , उसी निशचल सागर को जो मैने शुरू मे देखा था |
लेकिन अब मुझे पता है के इस नकाब के पीछे,
कितने ही नाव दुनिया के इस खेल मे डूब रही है |
कितने ही इंसान उन शह्तानी मछलियो के शिकार हो रहे है |
और कितने ही लोग हताशा मे आकर एक दुसरे को लूट रहे है |

इसी लिए कहता हू  बच्चे |
ना पड़ इस दुनिया के धोके मे |
ना जा इस किनारे के छोड़ के |

"
इस आवेशपूरित जीवनगाथा के बाद , फिर से उस द्वीप पर सन्नाटा छागया |


...To be continued

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