Wednesday, December 7, 2011

Jeevan Ka Safar - Part II

... continued from Jeevan Ka Safar - Part I




इस आवेशपूरित जीवनगाथा के बाद , फिर से उस द्वीप पर सन्नाटा छागया|
तब उस जवान सैलानी ने बदले मे ये कहा
"
काका! जब मै तुमे देखता हू, तो बताऊ मुझे क्या दिख्ता है ?
मुझे दिख्ता है एक चहरा |
बूढा और झुर्रियों से भरा, एक चहरा |
थका और मारा, तक्दीर का नहीं, अपने खुद के अपेक्षा का मारा, एक चहरा|


अब भी तेरी आँखें अपने चहरे के नकाब के पीछे से झांकती है,
उसी भूक की चमक से, जिसकी रौशनी तुम्हे तब अँधा बना चूका था |
आंधी और तूफ़ान, तो इस सफ़र के अनिवार्य हिस्से हैं |
जब एक हमसफ़र साथ हो, तो हैं ये कड्वी दवा, नहीं तो हैं ये विषैला ज़हर |
लेकिन तुझे हमसफ़र बनाने का वक़्त ही कहा, जब सारा वक़्त तू मंजिल की लाल्सा में बिताता रहा |


उस अंदेखी मंजिल की अपेक्षा में तूने अपने साथियो को अंदेखा कर दिया?
जब मंजिल की खोज ही वजूद बन जाये, तब आँखों पे गिर जाता है बेपरवाहट का काला पर्दा,
जिसमे से ना प्यार दिखता है ना चाहत,
दिखता है तो सिर्फ मंजिल को ढकता काला रुकावट |


अरे, तू क्या बद्नसीब है, जिसने कुछ पाया ही नहीं था, खोने को |
बद्नसीब तो मैं हू, जो खो गया मेरे अपनों को |
लेकिन हार नहीं मान ने वाला मैं तेरी तरह, क्यों की जीवन तो एक हिंडोला है,
जिसे रोक कर बैठ ना निरर्थक है |
"


इन बातो ने उस बूढ़े पर संजीवनी का असर किया| उस घायल की देखबाल करते हुए, जो अपने बीती हुई ज़िन्दगी की गलतिया उसको एहसास हो रही थी, इन बातो ने उन्हें जैसे दर्पण में दिखा दिया| फिर वो कैसे इस सैलानी को अकेला छोड़ फिर से वही गलती कर बैठता?


सुबह उठ दोनों, एक दूजे के हमसफ़र बन, जीवन के सफ़र पर निकल पड़े|
रास्ते की खबर अब भी नहीं थी, मंजिल की झलक अब भी नहीं था|
फिर भी एक दूजे के हमसाये में, राहत पाते हुए ,
शरीर की कश्ती लेकर ज़िन्दगी के सफ़र पर निकल चले थे |


फिर से गर्जा बादल, फिर से चम्की बिजली |
और पलक झपकने से पहले आस्मान से टपक रही थी वही मौत की डफ्ली |
भारी हवा के झोंके, अपने फूँक से इस आग में नयी जान भर रही थी |


निश्चल लहरों में इन बूंदों ने बवाल मचा दिया|
झूम उठी लहरे सारी, भागने लगी इधर उधर,
और झूलने लगी उस नाव को चारो सेहर |


उस तूफानी रात में उनका नाव ऐसे डोल रहा था, जैसे विधाता का फेका हुआ पासा |
समुन्दर उन सैलानियों के लिए कभी आस्मान बनता तो कभी ज़मीन |
ऐसे निरंतर संघर्ष करते करते हुए वो बूढा कब होश खो बैठा उसे पता ही न चला |


सुबह जब वो बूढा उठा तो उसने देखा, वही निश्चल सागर और वही चमकता सूरज, जैसे रात का तूफ़ान एक भयानक सप्ना हो | लेकिन नाव पे चीज़े सारी बिखरी पड़ी थी | पाल का कम्भा नीचे पड़ा था और पाल का तो कुछ पता ही नहीं | फिर भी सब कुछ इत्ना निश्चल था, जैसे सदियों से नाव इसी स्थिथि में हो | और इसी निश्चल्ता में समागया, उस जवान सैलानी का शांत चेहरा, जो अपनी आखरी सासें ले रहा था |


बूढ़े ने चिल्लाया,
"
हे विधाता | क्या यही है तेरा न्याय ?
कायर को दिया तूने हाथ, पर बहादुर को दिया मात?
जो तूफ़ान की गरज से डरकर, मंजिल की तलाश छोड़, गुफा में छुप गया, उसे तूने मशाल दी,
पर जो सीना तान आंधी का सामना करते मंजिल की और चल रहा था, उस पर बिजली गिरा दी ?
क्या यही है तेरा न्याय?
"


इस प्रलाप को सुन, वो जवान सैलानी, उस बूढ़े को पास बुला के कहा ,
"
काका, देखो उन कश्तियों को, अपनी ही तरह मंजिल की और बढती |
देखो कश्तियो में बसे उन लोगो के चहरो को, कुछ खुशियों का जश्न मनाती, तो कुछ बर्बादीयों का मातम मनाती|
कुछ मंजिल की चिंता करते साथियो को भूल जाती, तो कुछ साथियो के देखबाल में चिंता करना ही भूल जाती |


जब मैं इनको देख्ता हू, तो मेरी बीती ज़िन्दगी मुझे याद आती हैं|
मेरा चेहरा इन चहरो के जगह मुझे दिखाई देती है |
फक्र इस बात का है की वो मातम मनाता हुआ कम, और खुशिया मनाता हुआ ज्यादा दिखाई देता है |
मंजिल की चिंता करता हुआ कम, और अपनों की चिंता करता हुआ ज्यादा दिखाई देता है |


सुनो काका ! इसके आगे कोई डगर नहीं | इस सफ़र का कोई अंत नहीं |
बल्कि यही है वो मंजिल जिसे मैं महसूस कर रहा हूँ, जिसकी तलाश हम सबको हैं ,
वो है, फक्र अप्नी ज़िन्दगी पर |
यही है जीवन का मकसद, और यही है विधाता की परीक्षा- मर्ते वक़्त एक सवाल,
वो है, क्या तुम्हे हैं फक्र अप्नी ज़िन्दगी पर ?
"


इन बातों से उस सैलानी ने आखरी सास लिया | बूढ़े ने उस जवान को आसुओं से बिदाई दी | लेकिन तुरंत ही वो बूढा, इस दुर्भाग्य को पीछे लगाकर, एक नयी नाव की खोज में निकल पड़ा |


दुनिया के सागर में
शरीर की कश्ती लेकर ज़िन्दगी के सफ़र पर निकल चला है वो |
रास्ते की खबर है, और मंजिल की फिकर नहीं ,
हमसाये की खोज में
शरीर की कश्ती लेकर ज़िन्दगी के सफ़र पर निकल चला है वो |

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