Friday, January 25, 2013

SAMJHAUTA

चाहतें है दबी हुई
हवायें है ठहर गयी
ज़िन्दगी है रुकी सी हुई
वक़्त से हमने समझौता करलिया है ।

क्या दया है, क्या स्वार्थ!
क्या गलत है जहा ख़ुशी?
क्या अच्छा-बुरा और क्या दृष्टिकोण ?
कल जिस पे थे शर्मिंदा, उसी पे आज हस लेते है 
ज़मीर से हमने समझौता कर लिया है ।

क्या दिल्चस्वी है, क्या जुनून?
क्या दिखावा है और क्या है असल मे मस्ती?
प्रेरणा के बदले क्यूँ मन में है ईर्ष्या?
क्यों नहीं वक़्त उनके लिए जिनके पास है वक़्त हमारे लिए ?
छोड़ दिया है हमने कबसे इन सवालों का विचार
चरित्र से हमने समझौता कर लिया है ।

'कल' है वो चित्र जिसे तोलते है हर पल, 'आज' के दर्पण में अपने प्रतिबिम्ब से ।
चिंतित निरंतर के क्या ये हसीन है? क्या ये वही है?
अन्देखा कर उस चित्रकार को जो अभी से हमारे 'कल' को खीच रहा है।
यूही कट रहा है सफ़र, गाडी चल रही है आगे और हम पीछे की तरफ मुड कर बैठे है
चलाने वाले से हमने समझौता कर लिया है ।

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