Tuesday, January 13, 2015

Dug from the graveyard (archives) : KAVITHA KI IMARATH

कविता है वो इमारत, 
जिसकी सोच है बुनियाद और शब्द, दीवारें । 

जो सोच हो मज़बूत पर फीके हो दीवारें -
पत्थर का पहाड़ है,
टिकता है सालों साल, मगर छड़ता नही कोई बार बार । 

जो कम्ज़ोर है बुनियाद, पर शब्दों की है भूल भुलैय्या -
पत्तो का महल है,
देखते है सभी मूड मूड कर, मगर उजड़ जाता है जो अगले हवा के झोंके से । 

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